Sunday Special: चुनाव आयोग पर उठते सवालों की पूरी पड़ताल, SIR से लेकर ज्ञानेश कुमार पर लगे नए दावे तक
नई दिल्ली | 27 सितंबर 2026 | Inflowire Special Report
भारत में चुनाव सिर्फ मतदान की प्रक्रिया नहीं हैं। मतदाता सूची से लेकर उम्मीदवारों के नामांकन, मतदान और नतीजों तक पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता चुनाव आयोग की संस्थागत भूमिका से जुड़ी है। ऐसे में जब आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठते हैं तो विवाद केवल किसी एक अधिकारी या एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहता—उसका असर चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे की बहस तक पहुंचता है।
सितंबर 2026 के आखिरी सप्ताह में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग से जुड़े कई मुद्दे एक साथ चर्चा में हैं। इनमें मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR, दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियां और अब केरल के पूर्व मुख्य सचिव जिजी थॉमसन का 2016 की एक कथित बातचीत को लेकर दावा शामिल है।
इसलिए सवाल यह है कि अभी तक दस्तावेजों और सार्वजनिक बयानों से वास्तव में क्या सामने आया है?
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
हालिया विवाद का एक बड़ा हिस्सा मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर है।
Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में इन आपत्तियों को मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने, मतदाता डेटा तक पहुंच और SIR से जुड़े कुछ फैसलों से जोड़ा गया।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—किसी संस्थान के भीतर असहमति या आपत्ति दर्ज होना अपने आप में किसी निर्णय को अवैध साबित नहीं करता। असली सवाल यह है कि निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया और क्या वह लागू कानून एवं नियमों के अनुरूप था।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि SIR से जुड़े निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।
आयोग ने यह भी कहा कि आयोग के भीतर विचारों और टिप्पणियों में अंतर होना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि अंतिम निर्णय आयोग की सामूहिक मंजूरी से लिए जाते हैं।
आयोग ने मतदाताओं की सुविधा से जुड़े कुछ कदमों की भी घोषणा की। इनमें जरूरत पड़ने पर ऑनलाइन सुनवाई, परिवार के वयस्क सदस्य के माध्यम से ऑनलाइन उपस्थिति की अनुमति और कुछ वर्गों के मतदाताओं के लिए सहायता शिविर शामिल हैं। दिल्ली और महाराष्ट्र में दावे एवं आपत्तियां दाखिल करने की समय-सीमा भी बढ़ाई गई है।
फिर जिजी थॉमसन का दावा क्या है?
इसी विवाद के बीच केरल के पूर्व मुख्य सचिव जिजी थॉमसन ने एक पुरानी बातचीत का दावा सामने रखा है।
थॉमसन के मुताबिक, वर्ष 2016 में दिल्ली जाने वाली एक फ्लाइट के दौरान तत्कालीन वरिष्ठ IAS अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने उनसे पूछा था कि क्या वह 2019 लोकसभा चुनाव में BJP के टिकट पर पठानमथिट्टा से चुनाव लड़ना चाहेंगे।
थॉमसन के अनुसार, उन्होंने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। उनका दावा है कि उस बातचीत में चुनाव जीतने के बाद सांसद बनने और आगे केंद्रीय मंत्री बनने की संभावना की भी चर्चा हुई थी।
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि यह जिजी थॉमसन का दावा है। उपलब्ध रिपोर्टों में इस कथित बातचीत की स्वतंत्र पुष्टि करने वाला कोई सार्वजनिक दस्तावेज सामने नहीं आया है। इसलिए ये कह देना कि उनका दावा/आरोप सही है ये दुरुस्त नही है।
क्या ज्ञानेश कुमार ने इस आरोप का जवाब दिया है?
27 सितंबर तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, ज्ञानेश कुमार की ओर से इस विशेष आरोप पर कोई सार्वजनिक प्रत्यक्ष जवाब सामने नहीं आया है। NDTV की रिपोर्ट ने भी लिखा है कि ज्ञानेश कुमार ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इसका मतलब यह नहीं है कि आरोप पूरी तरह सही हैं या गलत। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि इस समय आरोप लगाने वाले का दावा है जबकि संबंधित ज्ञानेश कुमार की तरफ से अबतक कोई भी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
क्या SIR विवाद और थॉमसन का दावा एक ही बात साबित करता है ?
दोनों घटनाएं फिलहाल एक ही राजनीतिक माहौल में चर्चा में जरूर हैं, लेकिन इनके बीच सीधा संबंध साबित करने के लिए अलग से प्रमाण चाहिए।
एक तरफ SIR और आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया से संबंधित रिपोर्टें हैं। दूसरी तरफ 2016 की कथित निजी बातचीत का दावा है।
पूर्व मुख्य सचिव का यह दावा अपने आप में यह प्रमाणित नहीं करता कि चुनाव आयोग के वर्तमान निर्णय किसी राजनीतिक दल के पक्ष में लिए गए हैं। इसी तरह आयोग का यह कहना कि SIR के निर्णय सर्वसम्मति से हुए। दूसरी तरफ 2016 की कथित बातचीत को INFLOWIRE प्रमाणित या खारिज नहीं करता।
इन दोनों सवालों की जांच अलग-अलग आधार पर होनी चाहिए।
असली सवाल क्या हैं?
असली सवाल ये है कि चुनाव आयोग के भीतर निर्णय कैसे लिए जा रहे हैं?
यदि किसी संवैधानिक संस्था के सदस्यों के बीच किसी फैसले को लेकर अलग-अलग राय सामने आती है, तो जनता के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि अंतिम निर्णय की प्रक्रिया क्या थी और उसका रिकॉर्ड क्या कहता है।
SIR में मतदाता के अधिकारों की सुरक्षा कैसे होगी?
मतदाता सूची को अपडेट करना चुनाव प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में पात्र मतदाता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
2016 के दावे की स्वतंत्र पुष्टि होगी या नहीं?
जिजी थॉमसन ने एक गंभीर दावा किया है। अब यह देखना है कि क्या उस बातचीत से जुड़े कोई स्वतंत्र गवाह, दस्तावेज, contemporaneous record या अन्य कोई प्रमाण उपलब्ध है या नही।
इस पूरे विवाद का असर कहां पड़ सकता है?
चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और चुनावी प्रक्रिया में उसकी भूमिका केंद्रीय है। इसलिए आयोग से जुड़े विवादों में सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप महत्वपूर्ण नहीं होते।
महत्वपूर्ण यह है कि:
- मतदाता सूची की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?
- नाम जोड़ने और हटाने की व्यवस्था कितनी स्पष्ट है?
- आपत्तियों और अपील का प्रभावी रास्ता क्या है?
- आयोग के फैसलों का रिकॉर्ड कितना सार्वजनिक है?
- आयोग के भीतर अलग-अलग राय होने पर अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से दर्ज होता है?
- और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आम मतदाता को अपनी स्थिति समझने और सुधारने का पर्याप्त अवसर मिलता है?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब किसी भी राजनीतिक दावे से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
Inflowire Final Explained
चुनाव आयोग के SIR और उसकी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सार्वजनिक बहस चल रही है।
पूर्व केरल मुख्य सचिव जिजी थॉमसन ने दावा किया है कि 2016 में ज्ञानेश कुमार ने उन्हें BJP के टिकट पर 2019 लोकसभा चुनाव लड़ने का सुझाव दिया था। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं है।
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया कि SIR से जुड़े अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।
इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में निष्कर्ष निकालना नहीं, बल्कि यह है कि चुनावी संस्थाओं के फैसलों, मतदाता सूची की प्रक्रिया और उठाई गई आपत्तियों से जुड़े तथ्य कितने पारदर्शी तरीके से जनता के सामने आते हैं। यही लोकतांत्रिक संस्थाओं में भरोसे की बुनियादी कसौटी है।