बिहार पंचायत चुनाव में आरक्षण पर पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 125 साल पहले आए पूर्वजों के आधार पर नहीं कह सकते बाहरी !
पटना: बिहार में पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच आरक्षण को लेकर पटना हाईकोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी परिवार के पूर्वज 100 या 125 साल पहले दूसरे राज्य से बिहार आकर बस गए हों, तो केवल इस आधार पर उनके वंशज को पंचायत चुनाव में आरक्षण के लाभ से बाहर नहीं किया जा सकता।
यह फैसला सहरसा जिले की साहुरिया पंचायत के निर्वाचित मुखिया मो. ईसा से जुड़े मामले में आया है। अदालत के फैसले के बाद पंचायत चुनाव में आरक्षण और स्थानीय निवासी होने को लेकर चल रही बहस को नई कानूनी दिशा मिली है।
क्या है पूरा मामला?
मामला सहरसा की साहुरिया पंचायत से जुड़े मुखिया मो. ईसा की याचिका का है। रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पूर्वज करीब 125 साल पहले उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे। इसी आधार पर उनके पंचायत चुनाव में अत्यंत पिछड़ा वर्ग यानी EBC आरक्षण के लाभ पर सवाल उठाया गया था।
राज्य निर्वाचन आयोग ने इससे जुड़े मामले में उनका चुनाव रद्द कर दिया था। इसके बाद मो. ईसा ने पटना हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
पटना हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल यह तथ्य कि किसी व्यक्ति के पूर्वज कई दशक पहले दूसरे राज्य से बिहार आए थे, उसे बिहार का “बाहरी” निवासी मानने के लिए पर्याप्त नहीं है। खास तौर पर करीब 125 साल पहले बिहार में आकर बस चुके परिवार के मामले में केवल पूर्वजों के मूल स्थान को आधार बनाकर पंचायत चुनाव में आरक्षण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
मो. ईसा को मिली बड़ी राहत
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने मो. ईसा की याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित जाति स्क्रूटनी कमेटी की रिपोर्ट और राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश को रद्द कर दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, जांच से जुड़ी रिपोर्टों में भी उनके जाति प्रमाणपत्र को फर्जी नहीं माना गया था।
पंचायत चुनाव में कौन सा आरक्षण कानून लागू होगा?
फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू पंचायत चुनाव में आरक्षण के कानूनी आधार से जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनाव में आरक्षण का निर्धारण बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) के तहत किया जाएगा। सरकारी नौकरियों और सेवाओं में आरक्षण से जुड़े प्रावधानों को उसी रूप में पंचायत चुनाव में लागू नहीं किया जा सकता। इससे पंचायत चुनाव में आरक्षण को लेकर उठ रहे कानूनी सवालों पर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण सामने आया है।
क्या बिहार में 100 साल से रहने वाला हर व्यक्ति आरक्षण का हकदार होगा?
हाईकोर्ट का फैसला किसी भी व्यक्ति को केवल 100 या 125 साल रहने के आधार पर स्वतः आरक्षण देने का सामान्य आदेश नहीं है। मामला विशेष रूप से संबंधित व्यक्ति की जाति, निवास और पंचायत चुनाव में आरक्षण के कानूनी प्रावधानों से जुड़ा था। इसलिए प्रत्येक उम्मीदवार की पात्रता संबंधित कानून, जाति प्रमाणपत्र और चुनावी नियमों के आधार पर ही तय होगी।
पंचायत चुनाव की राजनीति पर क्यों पड़ेगा असर?
बिहार में पंचायत चुनाव को लेकर आरक्षण का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में हाईकोर्ट के इस फैसले से उन उम्मीदवारों और परिवारों के लिए राहत की स्थिति बन सकती है, जिनके पूर्वज लंबे समय पहले दूसरे राज्यों से बिहार आकर स्थायी रूप से बस गए थे। हालांकि, इस फैसले को सभी पंचायत चुनावों के लिए एक समान पात्रता प्रमाणपत्र के रूप में देखना सही नहीं होगा। उम्मीदवारों की पात्रता संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही तय होगी।
हाईकोर्ट के फैसले का सीधा मतलब
सरल भाषा में समझें तो अदालत का संदेश यह है कि किसी परिवार के पूर्वज का बहुत पुराने समय में दूसरे राज्य से बिहार आना, अपने आप में उस परिवार के वंशज को पंचायत चुनाव के आरक्षण से बाहर करने का आधार नहीं बन सकता।
यह फैसला सहरसा के एक विशिष्ट मामले से जुड़ा है, लेकिन इसका महत्व बिहार में पंचायत चुनाव के आरक्षण संबंधी बहस के लिहाज से काफी बड़ा है।
बिहार पंचायत चुनाव से पहले पटना हाईकोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। करीब 125 साल पहले दूसरे राज्य से बिहार आए पूर्वजों के आधार पर किसी व्यक्ति को केवल “बाहरी” बताकर पंचायत चुनाव के आरक्षण लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
साथ ही अदालत ने पंचायत चुनाव में आरक्षण के लिए लागू कानूनी प्रावधान को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है। अब इस फैसले का असर पंचायत चुनाव से जुड़े अन्य समान मामलों पर किस तरह पड़ता है, इस पर नजर रहेगी।
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