सुपुर्द-ए-खाक हुए अमौर के पूर्व विधायक जलील मस्तान, सीमांचल की राजनीति में चार दशक से ज्यादा की विरासत
पूर्णिया/अमौर: सीमांचल की राजनीति में लंबे समय तक अपनी अलग पहचान रखने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और अमौर के पूर्व विधायक अब्दुल जलील मस्तान अब इस दुनिया में नहीं रहे। दिल्ली में इलाज के दौरान 12 सितंबर 2026 को उनका निधन हुआ। वे 68 वर्ष के थे। उनके निधन के बाद अमौर, बैसा और आसपास के इलाकों में शोक का माहौल बना हुआ है।
जलील मस्तान की पहचान केवल एक पूर्व विधायक के रूप में नहीं रही। करीब चार दशक से अधिक समय तक उन्होंने सक्रिय राजनीति में रहते हुए अमौर और सीमांचल की राजनीति को प्रभावित किया। वे अमौर विधानसभा क्षेत्र से छह बार विधायक रहे और 2015 में बिहार की महागठबंधन सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने।
गांवगांव से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
अब्दुल जलील मस्तान का राजनीतिक सफर 1985 में शुरू हुआ। उन्होंने पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद वे कांग्रेस से जुड़े और धीरे-धीरे अमौर की राजनीति में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए।
अमौर जैसे सीमांचल के विधानसभा क्षेत्र में लगातार चुनाव लड़ना और कई बार जीत हासिल करना उनके राजनीतिक प्रभाव को दर्शाता है। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड और रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने अमौर का छह बार प्रतिनिधित्व किया।
छह बार विधायक, फिर बिहार सरकार में मंत्री
जलील मस्तान का राजनीतिक सफर विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 2015 में बिहार में महागठबंधन सरकार बनने के बाद उन्हें नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
उनके पास मद्यनिषेध, उत्पाद एवं निबंधन जैसे विभागों की जिम्मेदारी रही। खास तौर पर बिहार में शराबबंदी लागू किए जाने के दौर में मद्यनिषेध विभाग से जुड़े मंत्री के तौर पर उनका नाम राज्य की राजनीति में प्रमुखता से सामने आया।
सीमांचल की राजनीति में अलग पहचान
अमौर, बैसा और सीमांचल के इलाके लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक और बाढ़ जैसी चुनौतियों से जूझते रहे हैं। जलील मस्तान की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं स्थानीय मुद्दों के इर्द-गिर्द रहा।
उनके समर्थक उन्हें जमीन से जुड़ा नेता बताते रहे। गांव-कस्बों में लोगों के बीच उनकी मौजूदगी और स्थानीय समस्याओं को लेकर सक्रियता उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनी।
बीमारी के बाद दिल्ली में चल रहा था इलाज
निधन से पहले जलील मस्तान की तबीयत काफी खराब थी। सितंबर के शुरुआती दिनों में उनके गंभीर रूप से बीमार होने और दिल्ली के अस्पताल में इलाज चलने की खबर सामने आई थी। बाद में उनकी हालत बिगड़ने की जानकारी भी सामने आई।
12 सितंबर की रात दिल्ली एम्स में उनके निधन की खबर सामने आई। इसके बाद बिहार के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में शोक संदेशों का सिलसिला शुरू हुआ।
अंतिम विदाई में जुटे लोग
उनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक क्षेत्र सिरसी लाए जाने के बाद अंतिम संस्कार की तैयारियां की गईं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सिरसी चुनमारी गांव के पास नमाज-ए-जनाजा की व्यवस्था की गई और इसके बाद उनके निवास परिसर में बनाए गए कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की बात सामने आई।
राजनीतिक गलियारों में शोक
जलील मस्तान के निधन पर बिहार के कई राजनीतिक नेताओं ने शोक जताया। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उन्हें सक्षम राजनीतिक नेता और समाजसेवी के रूप में याद किया। बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने उनके निधन को सदन के लिए क्षति बताया। कांग्रेस और आरजेडी के नेताओं ने भी शोक व्यक्त किया।
उनका निधन ऐसे समय हुआ है जब बिहार की राजनीति एक महत्वपूर्ण चुनावी दौर से गुजर रही है। ऐसे में सीमांचल की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे जलील मस्तान का जाना उनके समर्थकों के साथ-साथ क्षेत्रीय राजनीति के लिए भी एक महत्वपूर्ण घटना माना जा रहा है।
जलील मस्तान की राजनीतिक विरासत
जलील मस्तान की राजनीति को केवल चुनावी जीत-हार के आंकड़ों से समझना आसान नहीं है। अमौर की राजनीति में उनका लंबा जुड़ाव, छह बार विधानसभा पहुंचना और राज्य सरकार में मंत्री बनना उनके राजनीतिक सफर के प्रमुख पड़ाव रहे।
सिरसी से शुरू हुआ उनका सफर बिहार सरकार के मंत्रिमंडल तक पहुंचा। अब उनके निधन के बाद उनके समर्थकों और क्षेत्र के लोगों के बीच सबसे बड़ी चर्चा यही है कि अमौर की राजनीति में उनकी जगह और उनके लंबे राजनीतिक प्रभाव की विरासत आगे किस रूप में दिखाई देगी। अब्दुल जलील मस्तान का राजनीतिक अध्याय भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन अमौर और सीमांचल की राजनीति में उनके करीब चार दशक लंबे सफर की चर्चा लंबे समय तक होती रहेगी।
जलील मस्तान का निधन सिर्फ एक पूर्व विधायक के जाने की खबर नहीं है, बल्कि सीमांचल की राजनीति के एक लंबे दौर के समाप्त होने की घटना है। छह बार विधायक और बिहार सरकार के कैबिनेट मंत्री रहे मस्तान ने अमौर की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई। अब उनके निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत और अमौर की अगली राजनीतिक दिशा पर भी नजर रहेगी।