भारतीय शांतिप्रिय हैं, तो सड़कों पर उतरने वाले भारतीय अशांति फैलाने वाले कैसे?
INFLOWIRE | National News
“भारतीय शांतिप्रिय होते हैं, सड़कों पर उतरकर समाज में अशांति नहीं फैलाते।” केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का यह बयान चर्चा में है।
लेकिन सवाल यह है कि अगर भारतीय शांतिप्रिय हैं, तो अपने अधिकारों और मांगों के लिए सड़कों पर उतरने वाले भारतीयों को किस नजर से देखा जाएगा?
क्या सड़क पर प्रदर्शन करना अशांति फैलाना है? क्या सरकार या किसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ आवाज उठाना गलत है? और आखिर शांतिपूर्ण विरोध तथा हिंसक उपद्रव के बीच अंतर क्या है?
आज के इस एक्सप्लेनर में समझिए पीयूष गोयल के बयान का संदर्भ, भारत में जारी प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि और लोकतंत्र में विरोध के अधिकार का महत्व।
आखिर पीयूष गोयल ने कहा क्या?
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 26 अक्टूबर को जर्मनी की राजधानी बर्लिन में भारतीय समुदाय से बातचीत के दौरान यह टिप्पणी की।
गोयल विदेशों में भारतीय समुदाय के सम्मान और उसकी छवि की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों में भारतीयों का स्वागत होता है, क्योंकि वे तोड़फोड़ नहीं करते और समाज में अशांति नहीं फैलाते।
उनकी टिप्पणी यूरोप के कुछ हिस्सों में जारी प्रदर्शनों और हिंसक घटनाओं के बीच में आई है । यानी उनके बयान का मुख्य संदर्भ विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय का आचरण था।
लेकिन भारत में चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों के बीच इस बयान ने एक दूसरा सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या विरोध के लिए सड़क पर उतरना अपने आप में अशांति फैलाना है?
संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, इन अधिकारों पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।
इसका मतलब साफ है—शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसा एक ही चीज नहीं हैं।
अगर नागरिक किसी नीति, सरकारी फैसले या चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, तो केवल विरोध करने के आधार पर उन्हें अशांति फैलाने वाला नहीं कहा जा सकता ये बात तो अस्पष्ठ है।
दूसरी तरफ यदि किसी प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़, हिंसा या दूसरे लोगों के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उन घटनाओं की जांच तथ्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए।
यानी विरोध का अधिकार भी जरूरी है और सार्वजनिक शांति बनाए रखना भी।
भारत में सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं लोग?
इस समय भारत में चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद और विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
विरोध करने वाले दलों और समूहों का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव से पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि सूची में मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और अन्य अपात्र प्रविष्टियों को हटाने की प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है।
इसी तरह चुनाव आयोग के फैसलों पर सवाल उठाना और उन सवालों का जवाब मांगना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है। किसी आरोप की सच्चाई और प्रदर्शन के तरीके का मूल्यांकन अलग-अलग किया जाना चाहिए।
बयान से उठा सबसे बड़ा सवाल
पीयूष गोयल का बयान विदेशों में भारतीय समुदाय की शांतिपूर्ण छवि की तारीफ के रूप में आया था। लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसका व्यापक अर्थ निकालकर बहस की जा रही है।
यहां सवाल केवल एक मंत्री के बयान का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में विरोध की भूमिका का भी है। अगर लोग अपनी मांग रखने के लिए शांतिपूर्वक सड़क पर उतरते हैं, तो उस कार्रवाई को अपने आप अशांति नहीं कहा जा सकता। साथ ही, प्रदर्शन के नाम पर हिंसा या तोड़फोड़ को भी लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में देश के प्रति सम्मान का मतलब सवाल पूछना बंद करना नहीं है; सवाल यह है कि उन सवालों को किस तरह उठाया जाता है और उनका जवाब किस तरह दिया जाता है।
तो पीयूष गोयल के बयान से निकला बड़ा सवाल यही है—क्या शांतिप्रिय भारतीय अपनी मांगों के लिए सड़कों पर नहीं उतर सकते?
संविधान शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, लेकिन कानून के दायरे में। इसलिए शांतिपूर्ण विरोध को हिंसा से अलग करके देखना जरूरी है।
सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना हो या किसी संवैधानिक संस्था से जवाब मांगना—लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि असहमति के लिए जगह बनी रहे और सार्वजनिक शांति भी कायम रहे।
आपकी राय क्या है—शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र की ताकत हैं या इनको लेकर नियम और सख्त होने चाहिए? अपनी राय जिम्मेदारी के साथ साझा कीजिए।