मस्जिद का लाउडस्पीकर या सावन का DJ: ध्वनि प्रदूषण पर नियम एक, फिर कार्रवाई अलग-अलग क्यों दिखती है?
INFLOWIRE / NATIONAL NEWS
नई दिल्ली: भारत में धार्मिक आयोजनों के दौरान तेज आवाज और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कोई नया मुद्दा नहीं है। कभी मस्जिदों के लाउडस्पीकर को लेकर विवाद खड़ा होता है तो कभी सावन और कांवड़ यात्रा के दौरान DJ और बड़े साउंड सिस्टम को लेकर सवाल उठते हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भारत में ध्वनि प्रदूषण के नियम धर्म और त्योहार के हिसाब से बदल जाते हैं?
कानूनी तौर पर इसका जवाब नहीं है। Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 के तहत लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल पर नियम लागू होते हैं। धार्मिक स्थल हो, जुलूस हो या कोई दूसरा सार्वजनिक कार्यक्रम—निर्धारित ध्वनि सीमा और अनुमति की शर्तें लागू रहती हैं।
लेकिन जमीन पर सवाल कानून से ज्यादा उसके समान और निष्पक्ष अमल को लेकर उठता है।
मस्जिदों के लाउडस्पीकर पर क्यों उठता है विवाद?
हाल ही में पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के कथित पुलिस निर्देशों को लेकर मामला कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचा था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस अधिकारियों ने कुछ मस्जिद समितियों को मौखिक रूप से लाउडस्पीकर हटाने के लिए कहा। हालांकि राज्य सरकार ने अदालत में ऐसे किसी निर्देश से इनकार किया और याचिका के समर्थन में पर्याप्त ठोस सामग्री होने पर भी सवाल उठाए।
इसके बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने PIL खारिज कर दी। अदालत के इस फैसले को मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने का नया आदेश समझना सही नहीं है।
यही मामला एक बड़े सवाल को जन्म देता है—अगर कार्रवाई का आधार ध्वनि प्रदूषण है तो क्या वही पैमाना दूसरे धार्मिक आयोजनों पर भी उतनी ही मजबूती से लागू होना चाहिए?
सावन में DJ को लेकर क्या तस्वीर सामने आई?

2026 की कांवड़ यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में प्रशासन ने DJ और साउंड सिस्टम को लेकर नियम तय किए थे।
मेरठ और बागपत में DJ ऑपरेटरों को निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करने को कहा गया। रिपोर्टों के अनुसार DJ और कांवड़ संरचनाओं की ऊंचाई तथा चौड़ाई पर सीमा लगाई गई और ध्वनि स्तर को 75 डेसिबल से नीचे रखने के निर्देश दिए गए।
यानी यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार ने कांवड़ यात्रा में DJ को पूरी तरह खुली छूट दे दी थी।
नियम वहां भी थे।
लेकिन असली सवाल है—क्या उन नियमों का पालन और निगरानी हर जगह एक जैसी हुई?
110 डेसिबल तक पहुंचा DJ का शोर, रिपोर्ट में सामने आया दावा
कांवड़ यात्रा के दौरान दिल्ली में कुछ DJ-युक्त वाहनों के आसपास बहुत ज्यादा ध्वनि स्तर रिकॉर्ड किए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
India Today ने कुछ कांवड़ वाहनों के पास 93 से 110 डेसिबल तक का स्तर रिकॉर्ड करने की बात कही। वहीं Hindustan Times की एक रिपोर्ट में भी कुछ कांवड़ कैंपों के आसपास 110 डेसिबल तक के पीक का उल्लेख किया गया।
यह आंकड़ा महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि आवासीय क्षेत्र में सामान्य अनुमत ambient noise limit दिन में 55 और रात में 45 डेसिबल है। लाउडस्पीकर के लिए भी अलग कानूनी सीमाएं और शर्तें लागू होती हैं।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि DJ बज रहा है या अजान के लिए लाउडस्पीकर इस्तेमाल हो रहा है।
सवाल यह होना चाहिए कि आवाज कितनी है, कितनी देर है, किस इलाके में है और क्या अनुमति तथा निर्धारित सीमा का पालन हो रहा है?
फिर लोगों को दोहरा रवैया क्यों दिखाई देता है?
यहीं से विवाद पैदा होता है।
किसी मस्जिद के लाउडस्पीकर को लेकर प्रशासन तुरंत कार्रवाई करता दिखाई दे और उसी समय किसी धार्मिक जुलूस में बड़े DJ सिस्टम लंबे समय तक चलते रहें, तो आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नियम सभी के लिए समान हैं या नहीं।
लेकिन इसके पीछे कई प्रशासनिक कारण भी हो सकते हैं।
. त्योहारों के लिए सीमित छूट
Noise Pollution Rules में राज्य सरकारों को कुछ सांस्कृतिक या धार्मिक अवसरों पर निर्धारित शर्तों के साथ रात के समय की पाबंदी में सीमित छूट देने की व्यवस्था है। यह छूट पूरे साल या हर कार्यक्रम के लिए नहीं होती और ध्वनि सीमा से जुड़ी शर्तें खत्म नहीं करती।
यानी त्योहार होना अपने आप में unlimited DJ की अनुमति नहीं है।
. अनुमति और स्थानीय आदेश
कई जगह प्रशासन धार्मिक जुलूसों और त्योहारों के लिए अलग से स्थानीय गाइडलाइन जारी करता है। उदाहरण के तौर पर कांवड़ यात्रा के दौरान DJ की संरचना, आवाज और रूट को लेकर स्थानीय प्रशासन ने अलग-अलग निर्देश जारी किए।
. सबसे बड़ा मुद्दा है Enforcement
कानून बनाना आसान है, लेकिन हजारों जुलूस, धार्मिक स्थल, DJ वाहन और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वास्तविक समय पर ध्वनि की निगरानी करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।
यही वजह है कि कहीं नियम का उल्लंघन होते ही कार्रवाई दिखाई देती है, जबकि कहीं शिकायत या निगरानी के बाद कार्रवाई होती है।
यहीं से “एक के लिए नियम, दूसरे के लिए छूट” जैसी धारणा पैदा होती है।
क्या धर्म के आधार पर ध्वनि प्रदूषण के अलग नियम हैं?
नहीं , कानूनी ढांचा धर्म के नाम पर अलग noise limit निर्धारित नहीं करता।
मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च या धार्मिक जुलूस—सभी को लागू ध्वनि प्रदूषण नियमों और स्थानीय अनुमति व्यवस्था का पालन करना होता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी रात के समय तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण को महत्वपूर्ण माना गया है।
इसलिए असली बहस मस्जिद बनाम मंदिर या अजान बनाम DJ की नहीं होनी चाहिए।
बहस होनी चाहिए—क्या कानून सब पर समान रूप से लागू हो रहा है?
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम शांतिपूर्ण जीवन
भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक गतिविधि के नाम पर किसी दूसरे व्यक्ति के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है।
यही कारण है कि अदालतों ने कई मामलों में धार्मिक गतिविधियों और noise pollution के बीच संतुलन की बात की है।
एक व्यक्ति के लिए धार्मिक आयोजन आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन उसी आयोजन की तेज आवाज दूसरे व्यक्ति के लिए नींद, पढ़ाई, काम या स्वास्थ्य की समस्या बन सकती है। इसलिए आस्था का सम्मान और शोर पर नियंत्रण—दोनों साथ चल सकते हैं।
सरकार के सामने असली चुनौती क्या है?
सरकार के सामने चुनौती यह नहीं होनी चाहिए कि किस धर्म के लाउडस्पीकर पर कार्रवाई की जाए।
चुनौती यह होनी चाहिए कि—
- ध्वनि की सीमा सभी के लिए समान हो।
- अनुमति की प्रक्रिया पारदर्शी हो।
- रात के समय के नियमों का पालन हो।
- धार्मिक स्थल और धार्मिक जुलूस दोनों नियमों के दायरे में हों।
- शिकायत मिलने पर कार्रवाई धर्म देखकर नहीं, ध्वनि स्तर और कानून देखकर हो।
- पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक हो।
अगर किसी मस्जिद का लाउडस्पीकर निर्धारित सीमा से ज्यादा आवाज करता है तो कार्रवाई होनी चाहिए।
अगर किसी मंदिर के कार्यक्रम, कांवड़ यात्रा या दूसरे धार्मिक जुलूस में DJ निर्धारित सीमा से ऊपर जाता है तो वहां भी वही कार्रवाई होनी चाहिए।
यही कानून के समान अनुपालन का मतलब है। सवाल DJ या लाउडस्पीकर का नहीं, पैमाने का है!भारत जैसे विविध देश में धार्मिक आयोजन हमेशा होते रहेंगे। अजान होगी, आरती होगी, कीर्तन होंगे, जुलूस निकलेंगे और सावन में कांवड़ यात्रा भी होगी। समस्या धार्मिक आस्था नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब आस्था की आवाज किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकार से टकराने लगे।
इसलिए आने वाले समय में सरकारों की असली परीक्षा यह होगी कि वे ध्वनि प्रदूषण को राजनीतिक या धार्मिक चश्मे से नहीं, बल्कि एक समान कानूनी पैमाने से देखें।
अगर सरकार किसी एक जगह noise pollution पर सख्त कार्रवाई करती है, तो जनता यह उम्मीद भी करेगी कि दूसरे धार्मिक आयोजनों में भी वही मानक लागू हों।
ध्वनि प्रदूषण का कोई धर्म नहीं होता। इसलिए कानून का पैमाना भी एक ही होना चाहिए।