पत्नी को घर के काम के लिए मजबूर नहीं कर सकता पति, Karnataka HC का फैसला
बेंगलुरु: कर्नाटक हाई कोर्ट ने वैवाहिक रिश्ते में महिला की स्वतंत्रता और घरेलू जिम्मेदारियों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पति अपनी पत्नी को घरेलू काम करने या अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए मजबूर या आदेशित नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा कि घर के काम पति और पत्नी के बीच साझा होने चाहिए।
सास-ससुर की सेवा को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस चिल्लकुर सुमलता की एकल पीठ ने कहा कि अगर माता-पिता को देखभाल की जरूरत है तो उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी उनके बेटे या बेटी की होती है। बहू या दामाद से सास-ससुर की देखभाल कराना जबरन नहीं थोपा जा सकता। कोर्ट के अनुसार इन-लॉज की देखभाल करना स्वैच्छिक होना चाहिए।
पति की दलील पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले में पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी शादी के कुछ समय बाद उसके माता-पिता की देखभाल नहीं करती थी, घरेलू काम नहीं करती थी और उसकी या उसके माता-पिता की अनुमति के बिना अपने मायके चली जाती थी।
कोर्ट ने इस तरह की दलीलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि विवाह किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के व्यवहार और इच्छाओं को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं देता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी को अपने माता-पिता से मिलने के लिए ससुराल के सभी लोगों से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।
‘विवाह नियंत्रण का लाइसेंस नहीं’
कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि विवाह “नियंत्रण, आदेश या वर्चस्व कायम करने का लाइसेंस” नहीं है। अदालत के मुताबिक पत्नी की पारिवारिक भूमिका को केवल आज्ञाकारिता या उसके द्वारा हर बात मानने के आधार पर नहीं आंका जा सकता। महिला की स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
घरेलू काम पति-पत्नी दोनों की जिम्मेदारी
अदालत ने यह भी कहा कि घरेलू गतिविधियां पुरुष और महिला दोनों को समान रूप से साझा करनी चाहिए। यानी इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि पत्नी को घर के काम से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है, बल्कि कोर्ट ने जबरदस्ती और एकतरफा घरेलू जिम्मेदारी थोपने पर सवाल उठाया है।
₹9 हजार मासिक भरण-पोषण का आदेश बरकरार
यह मामला केवल घरेलू कामकाज से जुड़े विवाद तक सीमित नहीं था। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पत्नी को ₹5,000 और नाबालिग बेटी को ₹4,000 यानी कुल ₹9,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने मौजूदा महंगाई और जीवन-यापन की लागत को देखते हुए ₹150 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन की राशि को भी न्यूनतम जीवन-स्तर के लिए पर्याप्त नहीं माना।
महिलाओं की स्वतंत्रता पर कोर्ट का जोर
अदालत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि शादी के बाद भी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा खत्म नहीं होती। पति-पत्नी के रिश्ते में आपसी सम्मान, सहयोग और समानता जरूरी है।
फैक्ट चेक: कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह नहीं कहा कि पत्नी को घर का कोई काम नहीं करना है। कोर्ट ने कहा कि पति पत्नी को घरेलू काम या अपने माता-पिता की देखभाल के लिए जबरदस्ती आदेश नहीं दे सकता और घरेलू जिम्मेदारियां पति-पत्नी को साझा करनी चाहिए।