EXPLAINER: नेपाल की बाढ़ में 933 लोग सुरंगों में कैसे फंसे?
Nepal Flood Explainer: 933 लोग सुरंगों में कैसे फंसे? बचाव इतना मुश्किल क्यों?
Nepal Flood Explainer: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ तबाही का आकलन करना नहीं, बल्कि उन लोगों तक पहुंचना है जिनका अभी तक कोई पता नहीं चला है।
नेपाल सरकार के 31 अगस्त के ताजा अपडेट के मुताबिक 903 शव बरामद किए जा चुके हैं और करीब 4,200 लोग अब भी लापता हैं। 10 हजार से अधिक लोगों को बचाया जा चुका है। सरकार के मुताबिक 39 देशों के करीब 590 विदेशी नागरिक भी अब तक लापता हैं।
लेकिन इन हजारों लापता लोगों में एक समूह ऐसा है, जिसकी तलाश ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है—
हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे कर्मचारी।
नेपाल के अधिकारियों के अनुसार करीब 933 हाइड्रोपावर कर्मचारी अलग-अलग परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। अब नेपाल सेना, भारत, चीन और दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञ इन सुरंगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन सवाल वही है
आखिर लोग सुरंगों में फंसे कैसे?
नेपाल का पहाड़ी भूगोल हाइड्रोपावर परियोजनाओं के लिए बेहद अनुकूल है। इसी वजह से बिजली परियोजनाओं में पहाड़ों के अंदर लंबी सुरंगें बनाई गई हैं।
26 अगस्त को जब तेज गति से बर्फ, चट्टान, मिट्टी और पानी का मलबा घाटियों से नीचे आया, तो उसने सड़कों, पुलों और परियोजनाओं के बाहरी हिस्सों को भारी नुकसान पहुंचाया।
कई जगह मलबा सुरंगों के प्रवेश मार्ग तक पहुंच गया।
नतीजा यह हुआ कि अंदर मौजूद कर्मचारियों का बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया।
यही वजह है कि इस समय रेस्क्यू ऑपरेशन का एक बड़ा हिस्सा सुरंगों के प्रवेश द्वार तक पहुंचने पर केंद्रित है।
सुरंग में फंसे व्यक्ति तक पहुंचना इतना कठिन क्यों है?
पहली नजर में लगता है कि मशीन लगाकर मलबा हटाया जा सकता है।
लेकिन पहाड़ के अंदर बनी सुरंग में ऐसा करना आसान नहीं होता।
बाढ़ के बाद वहां—
- मिट्टी और पत्थर जमा है।
- पानी का दबाव है।
- भारी मशीनें सीधे अंदर नहीं पहुंच सकतीं।
- दोबारा मलबा खिसकने का खतरा बना रहता है
इसलिए रेस्क्यू टीम को पहले सुरंग की संरचना और सुरक्षित रास्ते का पता लगाना पड़ रहा है। नेपाल सेना के इंजीनियर मलबा हटाने के लिए भारी मशीनों और नियंत्रित विस्फोटों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ जगहों पर सुरंग के हिस्सों तक पहुंच बनाने के लिए खुदाई की जा रही है।
यानी यह सामान्य बाढ़ राहत अभियान नहीं है।
यह एक साथ Flood Rescue,Tunnel Rescue और Engineering Operation बन चुका है।
क्या सुरंग के अंदर अभी लोग जिंदा हो सकते हैं?
यही इस पूरे ऑपरेशन का सबसे संवेदनशील सवाल है। कुछ परियोजनाओं में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए ऑक्सीजन और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाने की कोशिश की गई है। लेकिन कई सुरंगों में अंदर मौजूद लोगों से संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है। इसलिए प्रशासन की ओर से अभी सभी संभावित जगहों पर खोज जारी है। किसी व्यक्ति के जीवित या मृत होने की पुष्टि केवल सुरंग तक पहुंचने और वास्तविक स्थिति सामने आने के बाद ही की जा सकती है।
इसी वजह से “सभी की मौत हो गई” या “सभी लोग सुरक्षित हैं” जैसे दावे करना सही नही है।
भारत की टीम नेपाल में क्या कर रही है?
नेपाल सरकार के 31 अगस्त के आधिकारिक बयान के अनुसार भारत की 11 सदस्यीय Tunnel Rescue Team नेपाल में तकनीकी बचाव अभियान में काम कर रही है।
चीन की 9 सदस्यीय तकनीकी टीम भी रेस्क्यू ऑपरेशन में लगी है। इसके अलावा दक्षिण कोरिया की टीम भी सहायता कर रही है।
भारत ने केवल Tunnel Rescue में ही मदद नहीं की है।
नेपाल सरकार के मुताबिक भारत ने राहत सामग्री, ब्रिज यूनिट, जनरेटर, सोलर लाइट, DNA टेस्टिंग किट और अन्य आपातकालीन सामग्री भी उपलब्ध कराई है।
भारत की 18 सदस्यीय forensic/DNA विशेषज्ञ टीम भी 29 अगस्त से नेपाल में मौजूद है। उसका काम उन शवों की पहचान में सहायता करना है जिनकी पहचान सामान्य तरीके से संभव नहीं हो पा रही है।
यानी भारत की भूमिका सिर्फ राहत सामग्री भेजने तक सीमित नहीं है।
Rescue से लेकर Identification तक भारत की तकनीकी सहायता इस अभियान का हिस्सा है।
चीन की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
आपदा का क्षेत्र नेपाल-चीन सीमा से जुड़ा है।
बाढ़ का असर नेपाल के साथ चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी हुआ है। इसलिए दोनों देशों के लिए राहत और बचाव अभियान के साथ-साथ सीमा-पार नदी और मौसम संबंधी जानकारी महत्वपूर्ण हो गई है।
नेपाल सरकार ने 31 अगस्त को कहा कि नेपाल और चीन के बीच hydrological और meteorological data का real-time exchange जारी है। इसमें बाढ़, हिमस्खलन, ग्लेशियल झील और जल-जनित आपदाओं से जुड़ी जानकारी शामिल है।
यही जानकारी भविष्य में ऐसे इलाकों में समय पर चेतावनी देने के लिए महत्वपूर्ण होती है।
बाढ़ आई कैसे?
घटना के शुरुआती घंटों में भूकंप को लेकर भी चर्चा हुई थी। लेकिन बाद के वैज्ञानिक आकलन ने तस्वीर बदल दी। ताजा रिपोर्टों में ice-rock avalanche यानी बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के अचानक टूटकर नीचे आने को घटना का प्रमुख कारण बताया गया है। इससे भारी मात्रा में मलबा नदी में पहुंचा और उसके साथ पानी, पत्थर और मिट्टी का तेज बहाव नीचे की ओर चला गया। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इस घटना से पहले इलाके में वैसी भारी बारिश नहीं हुई थी, जैसी सामान्य बाढ़ में देखने को मिलती है। यही कारण है कि यह घटना सामान्य बारिश आधारित Flood Warning System के लिए भी चुनौती बन गई।
क्या इसे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहना सही है?
सिर्फ GLOF कहना अभी सही नहीं है।
घटना के शुरुआती विश्लेषण में ग्लेशियल झील के फटने की संभावना पर चर्चा हुई थी। लेकिन ताजा विशेषज्ञ आकलन में ice-rock avalanche और उससे बने debris flow की भूमिका ज्यादा स्पष्ट होकर सामने आई है।
इसलिए खबर में “ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़” या “बर्फ-चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने से बना मलबा-बहाव” कहना ही ठीक होगा।
वैज्ञानिक जांच अभी भी घटना की पूरी श्रृंखला को समझने में लगी है।
इतनी तेजी से मलबा नीचे कैसे पहुंचा?
हिमालय की भौगोलिक बनावट ने इस घटना को और खतरनाक बनाया।
ऊंचे पहाड़ों से नीचे आने वाला मलबा संकरी घाटियों और नदी के रास्तों में तेजी से आगे बढ़ता है। ताजा विश्लेषण में मलबा-बहाव की गति करीब 167 किलोमीटर प्रति घंटे तक बताई गई है। इतनी तेज गति में नीचे बसे लोगों के पास इतना समय ही नही मिल पाता है कि वो कुछ कर पाए।
इसी वजह से कई जगह नुकसान इतना अचानक हुआ कि लोगों को सुरक्षित निकलने का पर्याप्त समय नहीं मिला।
क्या Climate Change इसके लिए जिम्मेदार है?
इस एक घटना को सीधे Climate Change की वजह बताना अभी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
लेकिन वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की चिंता यह है कि हिमालय गर्म हो रहा है और ग्लेशियर, बर्फ तथा permafrost यानी लंबे समय से जमी जमीन में बदलाव पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
इससे ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसे जोखिमों को समझना और निगरानी करना पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
इसलिए नेपाल की यह घटना Climate Change की अंतिम “साबित” मिसाल नहीं है, लेकिन हिमालयी आपदा-जोखिम को लेकर गंभीर चेतावनी जरूर है।
बिहार में क्या हुआ?
इस घटना का असर नेपाल तक सीमित नहीं रहा। नेपाल से निकलने वाले नदी तंत्र का संबंध भारत के मैदानी इलाकों से है। 31 अगस्त को बिहार में गंडक और कोसी नदियों के जलस्तर में वृद्धि दर्ज की गई।
आकाशवाणी के अनुसार Valmikinagar Barrage और Kosi Barrage के सभी संबंधित गेटों को जलप्रवाह नियंत्रित करने के लिए खोला गया था। बाद के 24 घंटे में दोनों नदियों का जलस्तर और discharge घटा भी है। हालांकि West Champaran, East Champaran, Saran और Gopalganj प्रशासन को सतर्क रखा गया है।
इसलिए यहां दो अलग बातें समझना जरूरी है—
नेपाल की आपदा का असर नदी तंत्र के जरिए भारत तक पहुंचा है। लेकिन
इसका मतलब पूरे बिहार में बाढ़ आ गई है ऐसा कहना गलत होगा।
उत्तरप्रदेश में दिखा नेपाल की तबाही का सीधा असर
उत्तर प्रदेश में गंडक नदी से कई शव बरामद हुए हैं और उनमें से कुछ की पहचान की प्रक्रिया चल रही है।
31 अगस्त को महाराजगंज में बरामद चार शवों को DNA सैंपल लेने और कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद नेपाल प्रशासन को सौंपा गया। अधिकारियों ने बताया कि शवों की पहचान के लिए DNA डेटा का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह घटना दिखाती है कि इस आपदा का मानवीय असर सीमा पार तक पहुंच चुका है।
अब रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने लोग लापता हैं।
सबसे बड़ा सवाल है कि उन तक पहुंचने का रास्ता कहां से बनाया जाए?
सुरंगों में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए सेना के इंजीनियर मलबा हटा रहे हैं। कुछ जगहों पर सुरंग के मुहाने खोजे जा रहे हैं। भारी मशीनों और नियंत्रित विस्फोटों से रास्ता खोलने की कोशिश चल रही है।
लेकिन हर मीटर मलबा हटाने के साथ रेस्क्यू टीम को अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ रहा है। यही वजह है कि 933 हाइड्रोपावर कर्मचारियों की तलाश इस समय नेपाल के सबसे बड़े Search and Rescue Operations में से एक बन गई है।
नेपाल में हाइड्रोपावर परियोजनाओं ने देश की ऊर्जा क्षमता बढ़ाई है। लेकिन इन्हीं परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा कठिन पहाड़ी इलाकों और लंबी सुरंगों पर निर्भर है।
बाढ़ ने दिखा दिया कि जब प्राकृतिक आपदा सीधे इन परियोजनाओं को निशाना बनाती है तो नुकसान सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहता।
सुरंगों में काम करने वाले सैकड़ों लोगों की सुरक्षा भी एक बड़ा सवाल बन जाती है।
AP की रिपोर्ट के अनुसार हालिया बाढ़ से नेपाल की लगभग 10 प्रतिशत बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है और कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं के कर्मचारी अब भी लापता हैं।
अब कहानी बाढ़ की नहीं, जिंदगी बचाने की है।
26 अगस्त की वह विनाशकारी घटना अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है।
लेकिन उसका सबसे कठिन अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है।
नेपाल में 903 शव बरामद हो चुके हैं, करीब 4,200 लोग अब भी लापता हैं और करीब 933 हाइड्रोपावर कर्मचारियों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। भारत और चीन के विशेषज्ञ नेपाल के साथ मिलकर Tunnel Rescue में लगे हैं।
भारत की forensic टीम शवों की पहचान में मदद कर रही है।
बिहार और उत्तर प्रदेश में नेपाल से जुड़े नदी तंत्र पर प्रशासन निगरानी कर रहा है। और वैज्ञानिक अब यह समझने में जुटे हैं कि हिमालय में ऐसी घटनाओं की बेहतर निगरानी और समय रहते चेतावनी कैसे संभव हो।
इसलिए नेपाल की यह कहानी सिर्फ एक बाढ़ की कहानी नहीं है।
यह कहानी है—
पहाड़ के अंदर फंसी जिंदगियों की,
सीमा पार पहुंची आपदा की,
भारत की मदद की,
और उस हिमालय की बदलती तस्वीर की, जिस पर करोड़ों लोगों की सुरक्षा और पानी की व्यवस्था निर्भर है।