जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को क्यों हिरासत में लिया? SIR पर सवालों का जवाब कौन देगा?
Inflowire Explainer | 4 अक्टूबर 2026
दिल्ली का जंतर-मंतर पिछले तीन दिनों से सिर्फ एक प्रदर्शन स्थल नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर चल रहे बड़े राजनीतिक टकराव का केंद्र बना हुआ है।
2 अक्टूबर से 4 अक्टूबर के बीच प्रदर्शनकारियों को रोकने, हिरासत में लेने, बैरिकेडिंग करने और FIR दर्ज करने की पुलिस कार्रवाई हुई। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारी Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग से जवाबदेही और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं।
अब सवाल केवल यह नहीं है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन क्यों हुआ।
सवाल यह भी है कि पुलिस ने इतनी बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में क्यों लिया? SIR को लेकर आखिर विवाद क्या है? क्या सरकार या चुनाव आयोग ने कोई जवाब नहीं दिया? और क्या नागरिकों को सरकार या चुनाव आयोग के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है?
2 अक्टूबर: प्रदर्शन से पहले ही पुलिस ने कड़ी कर दी सुरक्षा
2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया गया था। प्रदर्शन में विपक्षी नेताओं, छात्र संगठनों और नागरिक समूहों के शामिल होने की घोषणा हुई थी।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके साथ ही नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 163 के तहत निषेधात्मक आदेश लागू थे।
पुलिस ने जंतर-मंतर और आसपास के रास्तों पर कई स्तर की बैरिकेडिंग की। प्रमुख मार्गों पर पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र बलों की तैनाती की गई। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए मध्य दिल्ली के कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास भी बंद किए गए।
पुलिस का तर्क था कि बिना अनुमति भीड़ जुटने से कानून-व्यवस्था और यातायात प्रभावित हो सकता है तथा लागू निषेधात्मक आदेशों का पालन कराना जरूरी था।
2 अक्टूबर को कितने लोगों को हिरासत में लिया गया?
यहां आंकड़ों में अलग-अलग रिपोर्ट सामने आई हैं।दिल्ली पुलिस की माने तो करीब 550 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई। हालाकिं मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पुलिस के आंकड़े से यहां संख्या अलग है यानी कि 700 से अधिक लोगों को हिरासत में लेने की बात सामने आई है। जबकि प्रदर्शनकारी संगठनों ने इससे कहीं अधिक संख्या का दावा किया।
Inflowire Fact: जंतरमंतर या आसपास से सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, लेकिन अलग-अलग पक्षों के आंकड़ों में अंतर है।
हिरासत में लिए गए लोगों में AAP नेताओं के अलावा छात्र संगठन और आम नागरिक भी शामिल थे।
पुलिस ने हिरासत क्यों ली?
दिल्ली पुलिस के अनुसार प्रदर्शन को अनुमति नहीं मिली थी और उस समय नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 163 लागू थी।
इस आदेश के तहत पांच या उससे अधिक लोगों की सभा, जुलूस, प्रदर्शन, धरना और नारेबाजी जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई गई थी। लेकिन सवाल यहीं से निकलता है कि क्या 2 अक्टूबर को जंतरमंतर के प्रदर्शन से कितना दिन पहले से धारा 163 लागू किया गया था और कियूं इसकी क्या वजह थी?
2 अक्टूबर की कार्रवाई के बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR भी दर्ज की।
3 अक्टूबर को तीन FIR दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई। इनमें BNS की धारा 223 के तहत विधिवत जारी सरकारी आदेश की अवज्ञा का आरोप लगाया गया।
यानी पुलिस की कार्रवाई का आधिकारिक आधार SIR का विरोध करना नहीं, बल्कि उस समय लागू निषेधात्मक आदेश और बिना अनुमति प्रदर्शन करना बताया गया।
यह अंतर समझना जरूरी है।
3 अक्टूबर: प्रदर्शन रुका नहीं, हिरासत का सिलसिला जारी रहा
2 अक्टूबर के बाद मामला शांत नहीं हुआ।
3 अक्टूबर को भी प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरिकेड लगाए और कई लोगों को हिरासत में लिया।
AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
पुलिस का वही तर्क था—प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी और निषेधात्मक आदेश लागू थे।
3 अक्टूबर की कार्रवाई में एक और गंभीर विवाद
3 अक्टूबर की कार्रवाई के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगाए।
महिला पत्रकारों की शिकायतें मिलने के बाद दिल्ली पुलिस ने मामले को निष्पक्ष जांच के लिए Crime Branch को भेज दिया है।
अब जांच यह तय करेगी कि लगाए गए आरोपों में तथ्य क्या हैं और जिम्मेदारी किसकी बनती है।
4 अक्टूबर: तीसरे दिन भी तनाव बरकरार
4 अक्टूबर को भी प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर की तरफ बढ़े।
AISA के प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच बैरिकेड के पास धक्का-मुक्की की स्थिति बनी। पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में लिया।
इसी दिन India Gate की तरफ प्रदर्शन कर रहे AAP कार्यकर्ताओं को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। इनमें दिल्ली AAP अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और विधायक संजीव झा भी शामिल थे।
इस तरह 2 से 4 अक्टूबर के बीच विरोध प्रदर्शन लगातार तीसरे दिन जारी रहा।
लेकिन असली विवाद SIR को लेकर है ?
चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को सही रखने के लिए मृत, डुप्लीकेट, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं की पहचान करना जरूरी है। आयोग की आधिकारिक व्यवस्था में मतदाताओं को अपना नाम खोजने, SIR से संबंधित फॉर्म भरने, शिकायत दर्ज करने और अपील करने की सुविधाएं उपलब्ध है।
लेकिन प्रदर्शनकारियों और विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं।
अगर कोई वास्तविक भारतीय नागरिक है और उसका नाम मतदाता सूची से हट जाता है, तो उसे अपना वोट बचाने की पर्याप्त और आसान गारंटी कैसे मिलेगी?
यही सवाल अब राजनीतिक विवाद के केंद्र में है।
चुनाव आयोग SIR को मतदाता सूची को शुद्ध और सही रखने की प्रक्रिया बताता रहा है। आयोग की व्यवस्था में नाम खोजने, शिकायत करने और अपील करने की प्रक्रिया भी उपलब्ध है।
4 अक्टूबर तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने यह भी कहा है कि प्रक्रिया का उद्देश्य गलत, डुप्लीकेट, मृत या अयोग्य प्रविष्टियों को हटाना है। वहीं शुक्रवार को आयोग ने अपने अधिकारियों को ऐसे पात्र मतदाताओं को दर्ज करने का निर्देश दिया, जो गलती से सूची से छूट गए हों।
लेकिन प्रदर्शनकारियों की आपत्ति अलग है।
वे सिर्फ प्रक्रिया की जानकारी नहीं चाहते।
वे चाहते हैं कि SIR में नाम हटाने के आंकड़े, प्रक्रिया की पारदर्शिता, प्रभावित मतदाताओं की संख्या और जवाबदेही से जुड़े सवालों पर सार्वजनिक और स्पष्ट राजनीतिक-प्रशासनिक जवाब दिया जाए।
यही वजह है कि विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है।
सरकार जवाब क्यों नहीं दे रही—या सवाल कुछ और है?
SIR का संचालन चुनाव आयोग करता है, जो एक संवैधानिक संस्था है। इसलिए हर सवाल का जवाब सीधे केंद्र सरकार से मिलने की स्थिति नहीं होती।
लेकिन जब SIR को लेकर राजनीतिक दल यह आरोप लगाते हैं कि मतदाता सूची में बदलाव से चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है, तब केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल पर भी राजनीतिक जवाब देने का दबाव बनता है।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग और BJP इन आरोपों को खारिज करते हैं और SIR को मतदाता सूची की शुद्धता से जोड़ते हैं।
इसलिए वर्तमान स्थिति को सबसे सटीक तरीके से ऐसे समझा जा सकता है:
जवाब पूरी तरह गायब नहीं है, लेकिन प्रदर्शनकारी जिस स्तर की सार्वजनिक जवाबदेही और स्पष्टीकरण मांग रहे हैं, वे उससे संतुष्ट नहीं हैं।
क्या लोगों को आंदोलन करने का अधिकार नहीं है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण एवं बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और विरोध लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हैं।
लेकिन यह अधिकार पूर्ण और असीमित नहीं है।
सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और अन्य नागरिकों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए कानून के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर से जुड़े मामले में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को मौलिक अधिकार माना, लेकिन यह भी कहा कि दूसरे नागरिकों के अधिकार और सार्वजनिक हित के साथ संतुलन जरूरी है।
एक अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विरोध के अधिकार को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता और प्रशासन को विरोध के लिए उचित व्यवस्था और दिशा-निर्देश बनाने चाहिए।
प्रदर्शन करना अधिकार है, लेकिन लागू कानूनों और उचित प्रतिबंधों की अनदेखी करना स्वतः अधिकार नहीं बन जाता।
और दूसरी तरफ—
प्रशासन के लिए भी यह पर्याप्त नहीं कि हर असहमति को सिर्फ प्रतिबंध और हिरासत के जरिए खत्म कर दिया जाए।
लोकतंत्र में दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।
अब 10 अक्टूबर को क्या होने वाला है?
2 से 4 अक्टूबर की घटनाओं के बाद आंदोलन और बड़ा होने के संकेत हैं।
Cockroach Janta Party यानी CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने घोषणा की है कि अगर CEC ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो 10 अक्टूबर को देशभर से लोगों को दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचने का आह्वान किया जाएगा।
इसे “Chalo Delhi” अभियान के रूप में पेश किया गया है और आयोजकों ने इसे शांतिपूर्ण आंदोलन बताया है।
इसके अलावा SFI और DYFI ने भी 9 अक्टूबर को देशभर में प्रदर्शन और 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर तक मार्च का ऐलान किया है।
यानी 10 अक्टूबर का कार्यक्रम केवल एक संगठन तक सीमित नहीं रहने के संकेत दे रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल
◆2 अक्टूबर को पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोका।
◆3 अक्टूबर को हिरासत और पुलिस कार्रवाई का सिलसिला जारी रहा।
◆4 अक्टूबर को भी प्रदर्शन और हिरासत की घटनाएं सामने आईं।
पुलिस कह रही है—अनुमति नहीं थी और निषेधात्मक आदेश लागू था।
प्रदर्शनकारी कह रहे हैं—SIR पर गंभीर सवाल हैं और लोकतांत्रिक तरीके से जवाब मांगना हमारा अधिकार है।
चुनाव आयोग कह रहा है—SIR मतदाता सूची को शुद्ध और सही रखने की प्रक्रिया है।
और राजनीतिक विपक्ष सवाल उठा रहा है—अगर मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है तो इसकी समीक्षा की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी क्यों न हो?
अब 10 अक्टूबर सिर्फ एक और प्रदर्शन की तारीख नहीं रह गई है।
यह इस बात की भी परीक्षा होगी कि सरकार, चुनाव आयोग, दिल्ली पुलिस और आंदोलनकारी—लोकतांत्रिक असहमति और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना अधिकार है, लेकिन उस सवाल का जवाब देना भी लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही का हिस्सा है।
Inflowire Note :
जंतर-मंतर का मौजूदा विवाद केवल पुलिस बनाम प्रदर्शनकारी नहीं है। इसके केंद्र में तीन बड़े सवाल हैं—मतदाता सूची की विश्वसनीयता, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार। इन तीनों सवालों का जवाब जितना स्पष्ट होगा, विवाद उतना ही कम होगा।