सियासत अपनी जगह, समाज के रिश्ते अपनी जगह: IUML नेताओं की बात ने क्यों खड़ा किया बड़ा सवाल?
Inflowire Special Report | 27 सितंबर 2026
धर्म, राजनीति और समाज के रिश्तों पर अक्सर बहस होती है। लेकिन कभी-कभी किसी नेता की कही एक साधारण-सी बात इस पूरी बहस को एक अलग नजरिए से देखने का मौका देती है।
मुंसिफ टीवी के एंकर मुनिश अनवर से हुई बातचीत के दौरान तमिलनाडु के वानियमबाडी से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग यानी IUML के विधायक सैयद फारूक बाशा SSB और केरल से IUML के राज्यसभा सांसद हारिस बीरन ने ऐसी बात कही जिसे आपको भी जानना जरुरी है।
फारूक बाशा 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में वानियमबाडी सीट से 73,181 वोट लेकर विजयी हुए थे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 2,982 वोट से हराया था । दिलचस्प बात यह है कि उपलब्ध 2011 Census आंकड़ों के अनुसार वानियमबाडी क्षेत्र में हिंदू आबादी करीब 79.36% और मुस्लिम आबादी महज 19.31% थी। यानी यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां मुस्लिम उम्मीदवार ने चुनाव जीतकर विधानसभा में जगह बनाई। लेकिन इस राजनीतिक जीत से ज्यादा चर्चा उस बात की होनी चाहिए जो बातचीत के दौरान सामने आई।
रोजा हो, फिर भी मंदिर के कार्यक्रम में जाना
फारूक बाशा ने बातचीत में बताया कि रमजान या रोजे के दौरान भी अगर किसी मंदिर की ओर से कार्यक्रम के लिए बुलावा आता है तो मुस्लिम नेता वहां जाते हैं। उनके मुताबिक इसी तरह मुस्लिमों के कार्यक्रम में हिंदू भी शामिल होते हैं और हिंदू समाज के कार्यक्रमों में मुस्लिमों को भी बुलाया जाता है।
यानी उनके शब्दों में— धर्म अपनी जगह है और समाज के रिश्ते अपनी जगह।
यह बात केवल किसी राजनीतिक भाषण का हिस्सा नहीं है। यह भारत के रोजमर्रा के सामाजिक जीवन में दिखाई देने वाली उस परंपरा की ओर इशारा करती है जिसमें पड़ोसी, दोस्त, कारोबारी और स्थानीय समुदाय कई बार धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर एक-दूसरे के सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं।
क्या उत्तर और दक्षिण भारत के सामाजिक रिश्ते सच में अलग हैं?
बातचीत में फारूक बाशा ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि उन्हें उत्तर भारत में धर्म के नाम पर नफरत और कट्टरता ज्यादा दिखाई देती है, जबकि दक्षिण भारत में सामाजिक दूरी उन्हें उतनी हावी नहीं लगती। भारत के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में सामाजिक संबंधों का अनुभव अलग हो सकता है। किसी एक नेता का अनुभव एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है, लेकिन वह पूरे देश के लिए सांख्यिकीय निष्कर्ष नहीं बन जाता।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि उत्तर बेहतर है या दक्षिण?
सवाल यह है कि क्या अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच रोजमर्रा के सामाजिक रिश्ते राजनीतिक मतभेदों से अलग रह सकते हैं?
आखिर सामाजिक दूरी बढ़ती क्यों है?
धर्म के नाम पर दूरी बढ़ने के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना आसान है, लेकिन वास्तविक तस्वीर तो कुछ और ही कहती है।___राजनीतिक दल और नेता अपने-अपने मुद्दों के आधार पर समाज को संबोधित करते हैं। कई बार धार्मिक पहचान राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है।
मीडिया और सोशल मीडिया ___किसी घटना की रिपोर्टिंग किस भाषा में होती है, कौन-सा हिस्सा प्रमुखता से दिखाया जाता है और सोशल मीडिया पर कौन-सा वीडियो वायरल होता है—इन सबका लोगों की धारणा पर प्रभाव डालता है।
धार्मिक नेतृत्व____मंदिर, मस्जिद और दूसरे धार्मिक संस्थानों से जुड़े प्रभावशाली लोगों की भाषा और संदेश भी समाज के माहौल को प्रभावित करती है।
स्थानीय रिश्ते____लेकिन इन सबके बीच एक और दुनिया है—आम लोगों की दुनिया। जहां पड़ोसी एक-दूसरे के घर आते जाते हैं। जहां दुकानदार ग्राहक को उसकी धार्मिक पहचान से पहले ग्राहक के रूप में देखता है। जहां बीमारी या परेशानी में लोग मदद के लिए आगे आते हैं। जहां त्योहार सामाजिक मेल-जोल का माध्यम बनता है ।
वानियमबाडी से निकलता एक सवाल
फारूक बाशा की चुनावी जीत को सिर्फ धार्मिक आंकड़ों से समझना भी अधूरा होगा। ECI के अनुसार 2026 में वानियमबाडी में उन्हें 73,181 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 70,199 वोट मिले। मुकाबला करीब था। इस चुनावी तस्वीर से कम-से-कम इतना जरूर दिखता है कि किसी उम्मीदवार की जीत को केवल उसकी धार्मिक पहचान से समझ लेना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में मतदाता कई मुद्दों और अपने स्थानीय अनुभवों के आधार पर मतदान करते हैं।
ऐसे में एक बड़ा सवाल जिसका जवाब खुद में खोजनी चाहिए वो ये कि ___ आम हिंदू और आम मुस्लिम का रिश्ता :____भारत की सामाजिक तस्वीर सिर्फ संसद, विधानसभा, चुनाव और टीवी बहसों से नहीं बनती। यह तस्वीर मोहल्लों में बनती है। स्कूलों में बनती है। बाजारों में बनती है। गांवों और शहरों की गलियों में बनती है। त्योहारों में बनती है। और मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ खड़े होने से बनती है।
इसलिए किसी भी धार्मिक समुदाय के करोड़ों आम लोगों के रिश्तों को केवल राजनीतिक बहस के चश्मे से देखना वास्तविक सामाजिक जीवन की पूरी तस्वीर नहीं है ।