चुनाव आयोग पर क्यों बढ़ा विवाद? प्रदर्शन, आरोप और 48 घंटे के अल्टीमेटम का पूरा मामला
INFLOWIRE EXPLAINER | 25 सितंबर 2026
भारत में चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग इस समय राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) और आयोग के भीतर कथित असहमति से जुड़े मुद्दों के बाद विपक्षी दलों और कुछ अन्य राजनीतिक संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
शुक्रवार, 25 सितंबर को कांग्रेस ने देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन किया। पटना समेत कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया।
लेकिन सवाल सिर्फ प्रदर्शन का नहीं है। आखिर चुनाव आयोग पर आरोप क्या हैं, आयोग के भीतर मतभेद की बात कहां से आई और 48 घंटे का अल्टीमेटम किसने दिया? आइए समझते हैं क्या है पूरा मामला ।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
मामले के केंद्र में मतदाता सूची का Special Intensive Revision यानी SIR है। इसी प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं।
विवाद उस रिपोर्ट के बाद और तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनावी सूची और उससे जुड़ी कुछ प्रक्रियाओं पर कई बार आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज की।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात है—इन मतभेदों को लेकर चुनाव आयोग का पक्ष भी सामने आया है। आयोग का कहना है कि बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है और महत्वपूर्ण फैसले आयोग की सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।
कांग्रेस ने देशभर में प्रदर्शन क्यों किया?
कांग्रेस ने 25 सितंबर को विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन का आह्वान किया था।
पार्टी की प्रमुख मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और उनके इस्तीफे की मांग शामिल है। कांग्रेस ने SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा की भी मांग उठाई है।
दिल्ली, पटना, चंडीगढ़ और अन्य स्थानों पर प्रदर्शन हुए। पटना में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को चुनाव कार्यालय की ओर बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया।
नेताओं के बयानों से विवाद और क्यों बढ़ा?
विवाद सिर्फ राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। कुछ नेताओं और संगठनों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ बेहद तीखे बयान भी सामने आए हैं।
CJP यानी कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 24 सितंबर को ज्ञानेश कुमार को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए और उन्हें इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है।
CJP ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है। संगठन ने इस्तीफा नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन और दिल्ली में धरने की चेतावनी दी है।
'देशद्रोही' और 'गोली मारने' जैसे बयान क्यों चर्चा में हैं?
इस विवाद में इस्तेमाल की गई भाषा ने भी राजनीतिक बहस को और तीखा कर दिया है।
CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए “देशद्रोही” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।
उधर बिहार में VIP प्रमुख मुकेश सहनी का एक बयान भी चर्चा में है रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कहा कि यदि उन्हें एक हत्या की माफी मिलती तो वे सबसे पहले ज्ञानेश कुमार को गोली मार देते। बाद में सहनी ने अपने बयान को संवैधानिक संस्थाओं के कथित दुरुपयोग के खिलाफ चेतावनी के रूप में बताया।
क्या चुनाव आयोग की कमियां साबित हो गई हैं?
उपलब्ध जानकारी में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक आरोप, आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट और आयोग का अपना पक्ष—तीनों मौजूद हैं।
इसलिए अभी यह कहना कि चुनाव आयोग की सभी कथित कमियां अंतिम रूप से साबित हो चुकी हैं ये दुरुस्त नही होगा।
उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं को लेकर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि करीब 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक ने अपील की थी। आयोग ने नाम हटाने के पीछे मृत, स्थानांतरित और डुप्लीकेट मतदाताओं जैसे कारणों का उल्लेख किया।
इससे साफ है कि मतदाता सूची को लेकर वास्तविक विवाद और कानूनी प्रक्रिया मौजूद है, लेकिन हर राजनीतिक आरोप को स्वतः सिद्ध तथ्य मानना अलग बात है।
अब आगे क्या?
CJP ने 48 घंटे के भीतर CEC के इस्तीफे की मांग की है और ऐसा नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।
वहीं कांग्रेस का आंदोलन भी 25 सितंबर को देश के कई हिस्सों में दिखाई दिया। पार्टी ने आगे भी विरोध जारी रखने की घोषणा की है।
ऐसे में चुनाव आयोग SIR और आंतरिक आपत्तियों से जुड़े सवालों पर क्या विस्तृत जवाब देता है।
वहीं अदालत में मतदाता सूची से जुड़े मामलों में क्या निर्णय सामने आते हैं।
वहीं राजनीतिक दलों के प्रदर्शन और मांगें आगे किस दिशा में जाती हैं।
INFLOWIRE निष्कर्ष
चुनाव आयोग को लेकर मौजूदा विवाद सिर्फ एक राजनीतिक बयान या एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में मतदाता सूची, SIR, चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही जैसे गंभीर मुद्दे हैं।
आने वाले दिनों में चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष, न्यायिक कार्यवाही और उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड इस विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।