जब दुनिया पढ़ना सीख रही थी, भारत में था हजारों छात्रों वाला विश्वविद्यालय! नालंदा का वो इतिहास जिसे जानकर चौंक जाएंगे
INFLOWIRE DESK TEAM
पटना/नालंदा: आज दुनिया की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों में पढ़ने के लिए छात्र अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप का रुख करते हैं। लेकिन करीब डेढ़ हजार साल पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी।
तब भारत का नालंदा एशिया के सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा और बौद्धिक केंद्रों में से एक था। दूर-दूर से विद्यार्थी और विद्वान यहां ज्ञान हासिल करने पहुंचते थे।
चीन से आने वाले प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु Xuanzang (ह्वेनसांग) और Yijing (ई-चिंग) का विवरण नालंदा के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है ! UNESCO के अनुसार नालंदा महाविहार ने लगभग 800 वर्षों तक ज्ञान के संस्थागत प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन सवाल है— आखिर ऐसा क्या था नालंदा में कि विदेशी विद्यार्थी हजारों किलोमीटर की यात्रा करके यहां पहुंचते थे?
नालंदा आखिर था क्या?
आज हम इसे आम तौर पर Nalanda University कहते हैं, लेकिन इसका ऐतिहासिक नाम Nalanda Mahavihara था।
यह वर्तमान बिहार के नालंदा जिले में स्थित था और बौद्ध शिक्षा, दर्शन, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा तथा अन्य ज्ञान परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था।
UNESCO ने Nalanda Mahavihara को World Heritage Site के रूप में सूचीबद्ध किया है और इसे प्राचीन भारत की उच्च शिक्षा की परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण माना है।

कब हुई थी नालंदा की शुरुआत?
नालंदा के इतिहास की शुरुआत को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक दावें हैं।
UNESCO के अनुसार नालंदा महाविहार का विकास 5वीं शताब्दी ईस्वी से 13वीं शताब्दी ईस्वी तक एक महत्वपूर्ण scholarly institution के रूप में हुआ।
गुप्त काल के दौरान इसका विस्तार हुआ और बाद में पाल शासकों के समय भी इसे संरक्षण मिला।
यानी यह कोई एक राजा द्वारा एक दिन में बनाया गया विश्वविद्यालय नहीं था।
सदियों के संरक्षण, विस्तार और विद्वानों की परंपरा ने नालंदा को विशाल ज्ञान केंद्र बनाया।
यहां सिर्फ भारत के छात्र नहीं आते थे
नालंदा की सबसे बड़ी खासियत इसका international character था।
प्राचीन चीन से आने वाले बौद्ध यात्री और विद्वान नालंदा पहुंचे।
ह्वेनसांग क्यों आए थे भारत?
7वीं शताब्दी में चीन के प्रसिद्ध बौद्ध यात्री Xuanzang भारत आए।
उन्होंने नालंदा में अध्ययन किया और वहां के बौद्ध दर्शन तथा विद्वत परंपरा का विस्तृत विवरण दिया।
बिहार पर्यटन के अनुसार Xuanzang ने नालंदा में कई वर्षों तक अध्ययन किया और उनके विवरण से उस समय के नालंदा के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। (tourism.bihar.gov.in)
उनके भारत आने का उद्देश्य केवल पर्यटन नहीं था। वह बौद्ध दर्शन और ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए भारत आए थे।

नालंदा पहुंचना आज जितना आसान नहीं था
आज दिल्ली से पटना या बिहार पहुंचने में कुछ घंटे लगते हैं।
लेकिन उस दौर में चीन से भारत की यात्रा आसान नहीं थी।
Xuanzang ने मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के रास्ते लंबी यात्रा की।
यह बताता है कि नालंदा की ख्याति सिर्फ आसपास के क्षेत्रों तक सीमित नहीं थी।
इसके ज्ञान की प्रतिष्ठा इतनी दूर तक पहुंच चुकी थी कि विदेशी विद्वान जोखिम भरी लंबी यात्राएं करके यहां आते थे।
कितने विद्यार्थी पढ़ते थे नालंदा में?
नालंदा में छात्रों और शिक्षकों की संख्या को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं।
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर नालंदा के विशाल परिसर में 10,000 विद्यार्थियों और 2,000 शिक्षकों का उल्लेख मिलता है। (incredibleindia.gov.in) इसी वजह से नालंदा को अक्सर प्राचीन दुनिया के सबसे बड़े residential learning centres में गिना जाता है। हालांकि इतिहासकारों द्वारा इन संख्याओं की व्याख्या और स्रोतों की विश्वसनीयता पर चर्चा की जाती रही है। प्राचीन नालंदा एक विशाल residential learning complex था, जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शिक्षक रहते और अध्ययन करते थे।
Admission आसान नहीं था!
नालंदा की एक और दिलचस्प बात थी—हर व्यक्ति को यहां प्रवेश नहीं मिल जाता था। ऐतिहासिक विवरणों में नालंदा में प्रवेश के लिए कठिन प्रश्नोत्तर और विद्वानों द्वारा विद्यार्थियों की परीक्षा का उल्लेख मिलता है।
यानी आज की तरह—
फॉर्म भरो और admission मिल गया—ऐसा नहीं था।
यहां आने वाले विद्यार्थियों को अपनी बौद्धिक क्षमता साबित करनी पड़ती थी।
इसी कारण नालंदा में अध्ययन करना उस समय प्रतिष्ठा की बात माना जाता था।

यहां क्या पढ़ाया जाता था?
नालंदा मुख्य रूप से बौद्ध दर्शन का बड़ा केंद्र था, लेकिन इसकी शिक्षा केवल धार्मिक अध्ययन तक सीमित नहीं थी।
यहां— बौद्ध दर्शन , तर्कशास्त्र , व्याकरण , चिकित्सा , दर्शन , भाषा और साहित्य , गणित तथा अन्य ज्ञान परंपराओं से संबंधित अध्ययन की परंपरा थी।
नालंदा सिर्फ भारत का नहीं, एशिया का ज्ञान केंद्र था
यहां का international connection केवल चीन तक सीमित नहीं था। नालंदा का प्रभाव बौद्ध दुनिया के बड़े हिस्से तक फैला हुआ था। पूर्वी और मध्य एशिया के बौद्ध विद्वानों तथा यात्रियों के साथ इसके संपर्क रहे। इसी वजह से नालंदा को आधुनिक भाषा में कहें तो—Ancient Asia का एक Global Knowledge Hub कहा जा सकता है।
फिर नालंदा का अंत कैसे हुआ?
नालंदा का इतिहास अचानक एक दिन में खत्म नहीं हुआ। 13वीं शताब्दी के आसपास इस क्षेत्र में राजनीतिक बदलाव और सैन्य आक्रमणों के बाद नालंदा का संस्थागत स्वरूप कमजोर हुआ। UNESCO के अनुसार 13वीं शताब्दी के बाद नालंदा महाविहार का संस्थागत जीवन समाप्त हो गया।

सदियों बाद फिर सामने आया नालंदा
समय बीतने के साथ नालंदा के विशाल अवशेष मिट्टी के नीचे दब गए। 19वीं शताब्दी में पुरातात्विक अनुसंधान और खुदाई के बाद नालंदा के प्राचीन परिसर को फिर से दुनिया के सामने लाया गया। आज यहां मौजूद ईंटों की विशाल संरचनाएं, विहार, मंदिर और अन्य अवशेष उस प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की कहानी बताते हैं।
UNESCO ने 2016 में Archaeological Site of Nalanda Mahavihara at Nalanda, Bihar को World Heritage List में शामिल किया।
सबसे बड़ा सवाल: क्या नालंदा दुनिया की पहली University थी?
नालंदा को अक्सर दुनिया की “पहली university” कहा जाता है, लेकिन यह दावा परिभाषा पर निर्भर करता है।
दुनिया में नालंदा से पहले भी उच्च शिक्षा के संस्थान और scholarly centres मौजूद थे।
इसलिए इसे “दुनिया की पहली यूनिवर्सिटी” कहना ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगा।
नालंदा प्राचीन दुनिया के सबसे बड़े और सबसे लंबे समय तक सक्रिय residential learning centres में से एक था। और इसका international character इसे असाधारण बनाता है।
जब ज्ञान के लिए दुनिया भारत की ओर देखती थी! आज शिक्षा के लिए भारतीय छात्र दुनिया के अलग-अलग देशों में जाते हैं। लेकिन इतिहास के एक दौर में तस्वीर उलटी थी। भारत का नालंदा दूर-दराज के देशों से विद्यार्थियों और विद्वानों को आकर्षित करता था। चीन के Xuanzang और Yijing जैसे यात्रियों के विवरण इस बात के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं कि नालंदा की ख्याति भारत की सीमाओं से बहुत आगे तक पहुंची थी। (tourism.bihar.gov.in)

आज नालंदा के खंडहरों के सामने खड़े होकर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है—
करीब 1500 साल पहले भारत में ऐसा शिक्षा केंद्र कैसे विकसित हुआ, जहां ज्ञान की तलाश में विदेशी यात्री हजारों किलोमीटर की यात्रा करके पहुंचते थे?
शायद यही नालंदा की सबसे बड़ी विरासत है—
इमारतें खत्म हो गईं, लेकिन ज्ञान के लिए सीमाएं पार करने की उसकी कहानी आज भी जिंदा है।